Us Paar : Uma Trilok : Book Review

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Us Paar…( Hindi )

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2015

by Uma Trilok 
 
रूहानी प्रेम ,आज तक के वक़्त में बहुत कम लोगों को एहसास होने वाला प्रेम ,इस पार तो सजन तुम हो ,”उस पार “न जाने क्या होगा ?जैसी उत्सुकता और रूहानी प्रेम से अंतरात्मा तक उतर जाने वाला यह “उमा त्रिलोक ” का उस पार उपन्यास पढ़ने के बाद भी दिल पर अपनी दस्तक देता रहता है। उमा जी का लिखा हुआ पहले मैंने अमृता प्रीतम पर पढ़ा था ,तब से उनके  लिखे की बहुत बड़ी फैन हूँ , एक दिन फेसबुक पर किसी कॉमन फ्रेंड के जरिये से मैं फेसबुक में इन तक पहुंची ,और फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजी ,और उमा जी से बात भी हो गयी ,अमृता जी के लिखे को ले कर ,और अमृता को पसंद करने वाले अजनबी कहाँ होते हैं ,मुझे भी उमा जी से बात करके ऐसा ही लगा कि न जाने कब से उन्हें जानती हूँ ,उसके बाद सुखद आश्चर्य यह हुआ कि उमा जी की लिखी हुई कुछ किताबे मेरे घर पहुँच गयी ,मेरे लिए ज़िन्दगी के अनमोल लम्हों में से यह एक लम्हा था ,,आते ही बुक्स मैंने पहले उनकी डिबिया चांदी की और अन्य कहानियाँ “पढ़ी पर और पढ़ते ही उस पर लिखने का दिल हुआ ,पर कुछ व्यवस्ता के कारण लिख नहीं पायी ,उमा जी से बात भी हुई कि  जल्द लिखूंगी ,फिर दो दिन पहले ही उनका उपन्यास उस पार पढ़ना शुरू किया और कल देर रात में खत्म किया ,इतने मोहित कर देने वाले लफ़ज़ और सुंदर शब्द चित्रण ,रुंहानी रूमानी खतों का सिलसिला ,मुझे भावविभोर कर गया ,नयनतारा और विक्रम के रूहानी प्रेम में कब कहाँ  उनके साथ साथ मेरे दिल की धड़कनों का सफर भी शुरू हुआ ,पता ही नहीं चला ,पहाड़ों पर खिले बगीचे के फूल ,के रंग दिल के कोने में खूब अच्छे से बिखरे उमा जी के लिखे शब्दों के साथ साथ ,और विक्रम के कहे शेर के साथ
कोई तो दर्दमंद दिल नासबूर था
माना कि तुम न थे कोई तुम सा जरूर था।
या
रौशनी सी कर गयी उसके बदन की  कुबर्तें
रूह में खुलता हुआ मश्रिक़ का दरवाज़ा लगा /
हर लिखा शेर दिल की  ,बात कहता लगा। नयनतारा और ब्रिगेडियर विक्रम की पहली मुलाक़ात ,बगीचे  सिलसिले में होती है ,और ब्रिगेडियर विक्रम नयनतारा को देखते ही पहचान जातें हैं कि यह प्रसिद्ध टेनिस प्लेयर हैं ,वह पहचान जिस से बचने के लिए नयनतारा सकून  से पहाड़ पर बने अपने बंगले पर रह रही है, सुन कर कुछ अच्छा महसूस  नहीं करती ,पर ब्रिगेडियर विक्रम के हंसमुख स्वभाव और दिलचस्प बातें उसको अपना सब सहजता से बता देती है ,फिर उनके बगीचे की सजावट के लिए आना जाना चार महीने  के उनके सहज दोस्ती के सफर को खुशनुमा बना देता है ,और पढ़ने वाला पाठक भी उस चार महीने के हरलम्हे को स्वयं जीता है , कम से कम मुझे तो ऐसा ही महसूस हुआ ,फिर अचानक से नयनतारा का जाना वो भी विदेश हैरान कर देता है ,वहां शुरू हुए खतों का सफर पढ़ने वाले को रूहानी प्रेम में पहुंचा देता है। . उमा जी के इसी लेखन का जादू मैंने उनकी अमृता इमरोज़ की लिखी किताब से ही छुआ है ठीक इस कहे सा प्यार में मन कवि हो जाता है वह कविता को लिखता ही नही कविता को जीता है “चार महीने का उनकी मुलक़ातों का सिलसिला खतों की मार्फत नूर बन के पढ़ने वाले  के दिल पर बरसता है।  यह पढ़ने का अपना अपना नज़रिया है ,किसी को वह खत जो नयनतारा और विक्रम के प्रेम के गवाह बने ,महज खत  सकतें हैं ,पर रूहानी प्रेम महसूस करने वाले के लिए या ज़िन्दगी के रूमानी फलसफे   हैं ,खतों के मार्फत ही बीती ज़िन्दगी की बातें हैं और आने वाले कल के नए रोशन लम्हात भी जो सतरंगी रंगो में रंगे हैं और प्रेम की खुशबू से साँसों की महका देते हैं।  अंत तक जाते जाते बस फिर आँखों में पानी ही रह जाता है।
उमा जी के लिखे इस उपन्यास ने अंत तक बांधे रखा , और हर चरित्र  के साथ जोड़े रखा ,यही उमा जी के लिखे का कमाल है ,सहजता और शब्द लेखन खूबी है उनके  इस उपन्यास की।  आपने अब तक नहीं पढ़ा है तो जरूर पढ़े। उमा जी का हार्दिक धन्यवाद जो अपने लिखे को पढ़ने का मौका दिया। “उस पार “प्रेम का ऐसा समपर्ण है जहाँ दो प्रेम करने वाल के बीच बहुत सहजता और सरलता पैदा हो जाती है। आपस की बातचीत में कोई औपचारिकता नही रहती। वो एक-दूसरे के विचारों के साथ-साथ भावनाओं और सपनो का भी हिस्सेदार बनने लगते हैं और यही घनिष्ठता एक-दूसरे के प्रति समर्पण का भाव पैदा करती है। एक ऐसा समपर्ण जिस में कोई अगर-मगर नही होता। यह स्थिति हर माहौल में एक-दूसरे को साथ निभाने का वचन देती है और फिर अलग-अलग जीवन बिताने का सोचा भी नही जा सकता।

यही इश्क का रिश्ता जब सब तरफ़ फ़ैल जाता है तो इस में किसी दूरी का दखल नही होता .किसी भी तर्क का दखल नही होता और न ही किसी तरह के त्याग का ..वह तो लफ्जों के भी पार चला जाता है ..और  यही है “उमा त्रिलोक “का “उस पार। ”

जल्द ही उनकी दूसरी किताब” डिबिया चांदी की तथा एनी कहानियाँ “के बारे में बात करते हैं यही पर 

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