Sahir Ludhianvi :अफसाना प्यार का

जब मैं अमृता के घर गई थी तो वहाँ  की हवा में जो खुशबू थी वह महक प्यार की एक एक चीज में दिखती थी इमरोज़ की खूबसूरत पेंटिंग्स ,और उस पर लिखी  अमृता की कविता की पंक्तियाँ ..देख के ही लगता है जैसे सारा माहोल वहाँ का प्यार के पावन एहसास में डूबा है ..और दिल ख़ुद बा ख़ुद जैसे रूमानी सा हो उठता है …

नाम की परछाई 

इमरोज़ ने साहिर के नाम को भी बहुत खूबसूरती से  केलीगार्फी में ढाल कर अपने कमरे की दिवार पर सजा रखा है ..”उमा जी” ने अपनी किताब में लिखा है की ..जब एक बार उन्होंने इमरोज़ से इसके बारे में पूछा तो इमरोज़ जी ने कहा कि जब अमृता कागज़ पर नही लिख रही होती थी तो भी उसके दाए हाथ की पहली उंगली कुछ लिख रही होती थी कोई शब्द कोई नाम कुछ भी चाहे किसी का भी हो भले ही अपना ही नाम क्यों न हो वह चाँद की परछाई में में भी शब्द ढूँढ़ लेती थी  बचपन से उनकी उंगली उन चाँद की परछाई में भी कोई न कोई लफ्ज़ तलाश कर लेती थी ..इमरोज़ बताते हैं की हमारी जान पहचान के सालों में वह उस को स्कूटर में बिठा कर रेडियो स्टेशन ले जाया करते थे ,तब अमृता पीछे बैठी मेरी पीठ पर उंगली से साहिर का नाम लिखती रही थी ,मुझे तभी पता चला था कि वह साहिर से कितना प्यार करती थी ..और जिसे अमृता इतना प्यार करती थी उसकी हमारे घर में हमारे दिल में एक ख़ास जगह है इस लिए “साहिर ” का नाम यूं दिख रहा है ..साहिर के साथ अमृता का रिश्ता खमोश रिश्ता था मन के स्तर का ,उनके बीच शारीरिक कुछ  नही था जो दोनों को बाँध सकता वह अमृता के लिए एक ऐसा इंसान था जिस  के होने के एहसास भर से अमृता को ख़ुशी और जज्बाती सकून मिलता रहा !!
साए इश्क के ……
चोदाहा साल तक अमृता उसके  साए में जीती रही .   दोनों के बीच एक मूक संवाद था ,वह आता अमृता को अपनी “नज्म “पकड़ा के चला जाता

जवान रात के सीने में दुधिया आँचल
मचल रहा है किसी ख्वाबे – मरमरीं की तरह
हसीं फूल ,हसीं पत्तियाँ,हसीं शाखें
लचक रही है किसी जिस्में-नाजनीं की तरह
फिजा में घुल गएँ हैं उफक के नार्म खुतूत
जमीन हसीं है .ख्वाब की सरजमीं की तरह
तसव्वुरात की परछाइयां उभरती है …

यही फिजा थी ,यही रुत    यही ज़माना था
यहीं से हमने मोहब्बत की इब्तिदा की थी   
धड़कते दिल से ,लरजती हुई निगाहों से
हजुरे -गैब में नन्ही सी इल्तिजा की थी
कि आरजू के कंवल खिल के फूल हो जाएँ
दिलो नज़र की दुआएँ काबुल हो जाएँ
तसव्वुरात की परछाइयां उभरती है ..

तुम आ रही हो जमाने की आँख से बच कर
नजर झुकाए हुए और बदन चुराए हुए
ख़ुद अपने क़दमों की आहट से झेपती,डरती
ख़ुद अपने साए की जुंबिश से खौफ खाए हुए ..
तसव्वुरात की परछाइयां उभरती है ..

मैं फूल टांक रहा हूँ तुम्हारे जूडे  में    
तुम्हारी आँख मुसरत से झुकी जाती हैं
न जाने आज मैं क्या बात कहने वाला हूँ
जुबान खुश्क में आवाज़ रुकती जाती हैं 
तसव्वुरात की परछाइयां उभरती है …

मेरे गले में तुम्हारी गुदाज बाहें हैं
तुम्हारे होंठों पे मेरे लबों के साये हैं
मुझे यकीन हैं कि हम अब कभी न बिछडेंगे
तुम्हे गुमान है कि हम मिल कर भी पराए हैं
तसव्वुरात की परछाइयां उभरती है ..

मेरे पलंग पे बिखरी हुई किताबों को
अदाए -अज्जो -कर्म से उठा रही हो तुम
सुहाग – रात जो ढोलक पे  गाए जाते हैं
दबे सुरों में वही गीत गा रही हो तुम
तसव्वुरात की परछाइयां उभरती है …

खुदा ने साहिर को जाने कितनी तौफीक दी होगी ,कि वे अपने तसव्वुरात की परछाइयां अक्षरों में उतार पाए ..और यही परछाइयां देखते -बुनते वे न जाने किस आकाश में खो गए ..कई बार अमृता की गली में पान की दूकान तक आता ,पान खाता और अमृता की खिड़की की तरफ़ देख के चला जाता और अमृता के लिए वह एक हमेशा चमकने वाला सितारा लेकिन पहुँच से बहुत दूर ..अमृता ने ख़ुद भी  कहा है कि साहिर घर आता कुर्सी पर बैठता ,एक के बाद एक सिगरेट पीता और बचे टुकड़े एशट्रे में डाल कर चला जाता .उसके जाने के बाद वह एक एक टुकडा उठाती और उसको पीने लगती ऐसा करते करते उन्हें सिगरेट की आदत लग गई थी !!

मायूस हूँ तेरे वादे से
कुछ आस नही ,कुछ आस भी है
मैं अपने ख्यालों के सदके
तू पास नही और पास भी है ….

हमने तो खुशी मांगी थी मगर
जो तूने  दिया अच्छा ही किया
जिस गम का तालुक्क हो तुझसे
वह रास नही और रास भी है ….

इश्क का जादू 
साहिर की लिखी यह पंक्तियाँ ..अपने में ही एक जादू सा जगा देती हैं .इश्क का जादू .. इश्क की इबादत .उस खुदा से मिलने जैसा ,जो नही पास हो कर भी साथ ही है ….यहाँ है और नही का मिलन वह मुकाम है .जो दिल को वहां ले जाता है जहाँ सिर्फ़ एहसास हैं और एहसासों की सुंदर मादकता …जो इश्क करे वही इसको जाने …जैसे
अमृता प्यार के एक ऐसे पहलु में यकीन रखती थी जिस में प्रेमी एक दूजे में लीन होने की बात नही करते वह कहती थी की कोई किसी में लीन नही होता है दोनों ही अलग अलग इंसान है एक दूजे से अलग रह कर ही वह एक दूजे को पहचान सकेंगे अगर लीन हो जाए तो फ़िर प्यार कैसे करोगे ?

साहिर की पंक्तियाँ अमृता के लिए … hqdefault

तू भी कुछ परेशान है /तू भी सोचती होगी
तेरे नाम की शोहरत तेरे काम क्या आई ,
मैं भी कुछ पशेमाँ हूँ /मैं भी गौर करता हूँ
मेरे काम की अजमत मेरे काम क्या आई |

चित्र गूगल के सौजन्य से (आज  #Sahir Ludhianvi )



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