Review: Without girls, Life can’t continue

बिटिया अब लगने लगी प्यारी ……

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अभी हाल में किया गया एक सर्वेंक्षण पढ़ा तो दिल खुश हो गया कि दिल्ली में आबादी का एक अच्छा खासा तबका यह चाहता है कि उनकी एक ही संतान हो और वह बेटी हो ..इस में बहुत से लोगों के विचार आमंत्रित किए गए थे जिस में से ७५% लोगों ने अपनी पहली चाहत बेटी ही बताई है इस में दिए गए तर्क में यह बताने की होड़ लगी थी कि समाज में लड़की की क्या अहमियत है और इंसान के लिए बेटी क्यों जरुरी है .

कुछ लोगो का कहना था कि लड़का लड़की एक दूसरे के पूरक हैं जिनसे समाज बनता है और दोनों के बिना काम नही चल सकता …अधिकतर लोगों ने भावात्मक पहलू को महत्व दिया कि आज के समाज में लड़की अपनी योग्यता से सारे पिछले मानदंडो को झुठला कर अपन विकास द्वारा यह सिद्ध कर के दिखा देंगी कि उनकी अपनी एक पहचान है ..कुछ लोगो का कहना था कि लड़की अपने माता पिता के प्रति ज्यादा फिक्रमंद होती है वह दूर जाने पर भी माता पिता से जुड़ी रहती है और वह एक सामजिक सामंजस्य बनाए रखने की एक अदभुत क्षमता रखती हैं ..यही वजह है की अब गैर जिम्मेदार बेटो की बजाये लोग बेटी का माता पिता बन कर ज्यादा गौरव महसूस करते हैं …एक महिला का तर्क बहुत ही अलग था कि अगर आपका नन्हा बेटा आपकी ऊँगली पकड़ के चलना चाहे तो उसको झटके नही उसको ,थाम कर चले क्या पता फ़िर यह ज़िंदगी आपको मौका दे या न दे ..जबकि लड़किया चाहे आपसे कितनी दूर हों आपसे बंधी रहेंगी .

चलिए सदियों के बाद ही सही लड़कियों की अहमियत तो समझी जाने लगी है मातृ शक्ति को सदियों पहले हमारे आदम समाज ने मान लिया था परन्तु जैसे जैसे मनुष्य विकास की और बढता गया वह अपने अतीत से दूर होता गया है दूसरी और हमारी आदिम जातियाँ अभी भी अतीत से दूर नही हुई है ..मध्य प्रदेश के बस्तर इलाके कुछ आदिवासी समाज में आज भी मातर सतामत्क व्यवस्था है और हैरानी की बात यह है कि वहाँ पुरुषों का भी विकास हो रहा है.
आज लडकियां हर जगह लड़कों से शिक्षा में आगे हैं ..इस चेतना का श्रेय निश्चित रूप से उन आत्मविश्वासी लड़कियों को जाता है जिन्होंने अपनी योग्यता के बल पर अपने आत्मविश्वास से सदियों पुरानी चली आ रही सामजिक बुराई के युद्ध को जीता है इसका कारण है शिक्षा —–शिक्षित समाज में जो लड़की के प्रति धारणा बदली है वह इसी प्रचार और प्रसार के कारण है इंदिरा गांधी से ले कर किरण बेदी ,अरुंधती राय ,मेघा पाटेकर , संतोष यादव जैसी अनेक नारियों ने शिक्षा के बल पर ही साबित कर दिया है कि उनके पास भी पुरुषों जैसा दिल और दिमाग है बस जरुरत है उन्हें एक मौका मिलने की एक अवसर की एक सही ख़ुद को साबित करने की ..और यह सिथ्ती अब सिर्फ़ शहरों में नही कस्बों और गांवों में भी देखने को मिल रही है भले की यह अभी कम है पर शुरुआत हो चुकी है पंचायतो में स्त्री की भागीदारी इसका एक उदाहरण है ..राजस्थान में ११० साल के बाद बारात की अगवानी इसी बदलती सोच का नतीजा है भारत और अन्य विकासशील देशों में महिलाओं के विकास की दरों में बहुत सुधार आया है .
.एडवांस समझे जाने वाली फ्रेंच संसद में ६ % सीट महिलाओं की है क्यूबा में यह आंकडा २३ % है ब्रिटेन अभी भी महिलाओं के मामले में ज्यादा आगे नही जा पाया है ,श्रीलंका में व्यावसायिक तकनीकी महिला की दर ४९ % है …इस तरह अभी भी भारत में अधिक से अधिक जागरूकता लाने की जरुरत है ..फ़िर भी यह एक सुखद बदलाव है कि आज बेटी को सामाजिक अभिशाप के रूप में नही लिया जा रहा है !

यह जानकारी दिल्ली में किए गए एक सर्वेंक्षण के आधार पर है !!

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