MERI DELHI (चिल्ड्रेन्स पार्क) कल और आज

  1.    मेरी दिल्ली ,वैसे बहुत ही खूबसूरत है ,पर सर्दी में यह और निखर कर सुंदर हो जाती है । यहाँ के दर्शनीय स्थल और भी खिल उठते हैं । इंडिया गेट के लॉन परिंदों के साथ साथ रंग बिरंगे परिधान में सजे हुए लोगों से भी भर जातें हैं । इंडिया गेट के साथ लगा चिल्ड्रेन पार्क बच्चों की खिल खिलाहट से गूंज उठता है , और इसी सुन्दर दृश्य से रूबरू होने के लिए हमने “चिल्ड्रेन पार्क “जाने का मन बनाया . पर यह चिल्ड्रन पार्क अब वह पार्क नहीं था ,जिसमे हमने अपने बचपन की और अपने बच्चों की बचपन की यादों से संजो रखा था । ” नहीं -नहीं “पार्क की सुन्दरता में शायद कोई कमी  आई हो पर नियम कानून बदल चुके हैं l  हम तो अपनी पहली यादों के सहारे ही खाना बना कर बच्चों के बच्चों के साथ “ज़िन्दगी की किताब” में “यादों का एक नया पन्ना जोड़ने गए थे ।  किन्तु मुख्य गेट पर ही हमें रोक कर कई प्रश्नों से रूबरू होना पड़ा ।

नियम एक आपके साथ १२ साल से छोटा बच्चा है ? यदि बच्चा साथ नहीं है तो आप नहीं अन्दर जा सकते हैं ।

नियम २ आप खाना साथ नहीं ले सकते हैं ,अन्दर किसी भी पार्क में आपका खाना नहीं जा सकता ,हाँ कोल्ड ड्रिंक्स और चिप्स इत्यादि जा सकते हैं ।
नियम ३ कोई यंग कपल अब अंदर एंट्री नहीं ले सकते हैं l
गेंद और कोई भी पौधों को नष्ट करने वाली खेल अन्दर नहीं जा सकती है ।
अब सोचे तो यह क्या चिल्ड्रेन पार्क हुआ जी ? अब बच्चे अन्दर जा कर गेंद से खेल नहीं सकते ,भूख लगे तो चिप्स इत्यादि तो खा लें पर घर का बना खाना नहीं । और १२ साल से बच्चा बड़ा है तो क्या वह अन्दर झूले नहीं झूल सकता ? आदि आदि ऐसे कितने ही प्रश्न दिमाग में थे .गुस्सा भी था ,खाना के टोकरी ले कर गेट के साथ बने गार्ड साहब के कुर्सी पर कब्ज़ा करके बैठ गयी ,की चलो बाकी सब बच्ची को झूला ,घुमा लाओ हम यहाँ बैठे खाने की रखवाली भी करते हैं और इस सवालों के जवाब भी तलाश करते हैं ।
नज़ारा बहुत ही दिलचस्प था गेट के बाहर का ,आधे से अधिक लोग खाना ले कर आये हुए पर अंदर एंट्री नहीं तो बहस बाज़ी चल रही थी l यह तो हम महिला थे ,तो कुछ रिक्वेस्ट कुछ अपनी पर्सनलिटी का रुआब जताते हुए गार्ड साब की कुर्सी पर जम गए थे ,पर बाकी जो फॅमिली के साथ थे बहुत ही परेशान थे । गार्ड भी परेशान ,पब्लिक भी परेशान ,अब चुप रहना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था ,पर मुझसे अधिक शायद उत्सुक गार्ड साब थे बताने को ,मैं देख रही थी बहुत से लोग चकमा दे कर अन्दर खाना ले जा रहे थे ,पर अन्दर घूमते गार्ड वापस बाहर भेज रहे थे उन्हें ,आखिर यह हालत क्यों बने ? जब गार्ड ने बताया सब तो समझ आया ,हम आप जैसे लोग ही इन हालात के जिम्मे वार हैं l कैसे नियम एक बच्चा साथ नहीं या १२ साल से बच्चा कम उम्र का है तो आज के बढ़ते नेट युग प्रभाव ने इस तरह के पार्क को भी बुद्धा गार्डन ,जैसे स्थल पर बदलना शुरू कर कर दिया था । तभी यह नियम बना , पर गार्ड साहब ने बताया की दिल्ली में लोदी गार्डन ,नेहरुपार्क , जैसे पार्क होते हुए भी ,कई यंग बच्चे बहार खड़े पेरंट्स से बच्चे उधार मांग के अन्दर आने की कोशिश करते हैं l और तो और दिवार छोटी है लड़के लडकियां हम नहीं सुधरेंगे के अंदाज़ में अन्दर कूद आते हैं ।
नियम दो खाना नहीं ले जाने दिया जाता क्यों की हम बेसिकली “जंगली लोग” हैं जो सफाई का ध्यान नहीं रखते ,खाने में अक्सर आसान बिरयानी जैसी चीजे होती है ,जो खाने के बाद वहां वैसे ही बिखरी रहती है या कूड़ेदान में फेंक दे जाती है , जो कि कुत्ते रात में आ कर सब जगह बिखेर देते हैं और इसी बचे खाने के चक्कर में दिन में वह  बच्चों पर झपटते हैं ।   तो हुए न हम ही इस तरह के कानून को बनाने के जिम्मे वार ? सफाई रखे ,अपना पार्क समझे तो यह समस्या हो ही न ।
गेंद और खेल नन्हे लगे पौधो को खराब कर देते हैं और हमने अपने बच्चों को यह सिखाया भी नहीं है नन्ही पौध या खेलते हुए अन्य पौधो का ध्यान रखे तो यह भी कानून बनाना ही था ।  इस पार्क में कोई टिकट नहीं ,आम ख़ास सब बच्चों के लिए यह पार्क ओपन हैं ,पर गार्ड साब का इस पर भी एक सुझाव था कि यदि सरकार यहाँ एंट्री के “दस या पांच रूपये” भी टिकट लगा दे तो आधी बेफालतू की पब्लिक कम हो जाए । पर मैं इस से सहमत नहीं हुई ,यही कहा कि कुछ कोई जगह तो है इन मासूमो के लिए भी जहाँ यह अमीर गरीब का भेदभाव से दूर हैं । बहुत अमीर बच्चे तो यहाँ वैसे भी नहीं आते होंगे ,उडती धूल और अन्य अमीरों वालीं सुविधाएं झूले जैसे नहीं है तो वह यहाँ क्यों आयेंगे । मिडिल क्लास और निम्न क्लास के बच्चों के लिए यह जगह जन्नत से कम नहीं है l मुझे तो अपना भी बचपन खूब याद आता है यहाँ पर झूलता हुआ और अपने बच्चों का भी । पर अब यह कानून है तो यह भी हमारे खुद की लापरवाही के नतीजे से बने हैं ।
मानिए इन्हें और बेकसूर खड़े इन गार्ड पर गुस्सा न उतारे ,वो अपनी डियूटी के चलते चेकिंग भी करेंगे और सामान जो मना है अंदर भी नहीं ले जाने देंगे । बच्चों को आराम से झूले झुलायें ,उन्हें सफाई और पौधो को ध्यान रखने का महत्व समझाएं । बाकी पिकनिक के लिए इस पार्क के सामने इंडिया गेट के लान है ,जो आप ने अब की देखी हालत की तरह गंदे ,और खाने पीने के बचे सामान को वहीँ छोड़ कर रखने हैं तो यह लान भी बस दूर से देखने का सपना बन सकते हैं ।जिन पर आप सिर्फ कानून के तहत ही घूम पायेंगे ।मर्जी है आपकी ,आखिर क्यूंकि दिल्ली भी है आपकी ।

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