Mansoon ki aahat

couple-rain

 

 

देख के सावन झूमे है मन
दिल क्यूँ बहका लहका जाए
बादल की अठखेलियाँ
बारिश की बूदें
मिल के दिल में
उत्पात मचाए

भीगे मन और तन दोनो
ताल-तलैया डुबो जाए
देख के सब तरफ हरियाली
मयूर सा दिल नाचा जाए

तीज का त्योहार .सावन की फुहार …
कुछ उमड़ धुमड के मनवानये गीत रचने लगता है ..ऐसा माना जाता है की संसार में सावन के सौंदर्य से सुंदर कुछ भी नहीं है। गर्मी में झुलसी प्रकृति मानों बारिश की बूंदों में नहा कर एक बार फिर से  नयी खिली सी हो जाती है , ताकि वह भी तीज के साथ शुरू होने वाले त्योहारों के सिलसिले में अपने पूरे श्रंगार के साथ भाग ले सके।
तीज दो बार मनाई जाती है, पहली सावन के महीने में, जिसे छोटी तीज कहते हैं और दूसरी राखी के बाद, जिसे बड़ी तीज कहते हैं। छोटी तीज अधिक प्रसिद्ध है। गर्मी के मौसम  के बाद त्योहारों की कड़ी में तीज पहला त्योहार है, जिसके बाद से त्योहारों की झड़ी लगनी शुरू हो जाती है, इसलिए कहा जाता है, तीज त्योहारां बावड़ी, ले डूबी गणगौर। अर्थात तीज त्यौहारों को अपने-अपने साथ लेकर आती है है, जिनको गणगौर अपने साथ वापस ले जाती है।
यह त्योहार  उत्तरी भारत के सब नगरों में विशेष रूप से मनाया जाता है,घर घर झूले पडते है,  राजस्थान में  इसे बेटियों से लाड़ लड़ने वाला दिन माना गया है। सावन में सुन्दर सुन्दर पकवान गुंजिया घेवर फैनी आदि बेटियों को सिंघारा   भेजा जाआ है,बायना छूकर सासू को भेजा या दिया जाता है,इस तीज पर मेंहदी लगाने का विशेष महत्व है,स्त्रियां हाथों पर मेंहदी से भिन्न भिन्न प्रकार के बेल बूटे बनाती है,तीजों पर मेंहदी रचाने की कलात्मक विधियां परम्परा से स्त्री समाज में चली आ रही है,स्त्रियां पैरों में आलता भी लगाती है,जो सुहाग का चिन्ह माना जाता है। कहते हैं कि इस दिन गौरी (पार्वती ) जी तपस्या कर के   शिव से मिलीं थीं इस लिए इस दिन माता पार्वती की सवारी निकाली जाती है,लडकियां इस दिन  भगवान शिव और पार्वती  की पूजा करती है
गांवों में हरे रंग की चूडियां  और साडि़यां व ओढनी ओढ़ महिलाएं तीज की सवारी में लोकगीतों की  झड़ी लगा देती हैं। दो से तीन दिन चलने वाले मेले में सजे हुए हाथी, ऊंट बैलगाड़ियां  लोक-नृत्य करती महिलाएं व पुरुष सभी कुछ रोमांचित करने वाला होता है।’राजस्थान की राजधानी जयपुर में तीज के त्यौहार का विशेष महत्व है।राजा सूरजमल के शासन काल में इस दिन कुछ पठान कुछ स्त्रियों को अपहरण करके ले गये थे,जिन्हे राजा सूरजमल ने छुडवाकर अपना बलिदान दिया था,उसी दिन से यहां मल्लयुद्ध का रिवाज शुरु हो गया था। जयपुर में यह त्यौहार बड़ी ही धूम-धाम से मनाया जाता है व तीज की सवारी निकाली जाती है। पूरा शहर सांस्कृतिक वातावरण से परिपूर्ण हो जाता है।

श्रावण मास के शुक्लपक्ष की तृतीया (तीज) को हरियाणा  में झूलों  का त्यौहार मनाया जाता है जिसे श्तीजश् के नाम से जाना जाता है । वैसे श्तीजश् एक लाल रंग का प्यारा सा कीट होता है जो मिट्टी में रहता है और बरसात के दिनों में तीज त्यौहार के समय ही दिखाई पड़ता है । इस त्यौहार से शुरुआत होती है बहुत से त्यौहारों की जो की  देवोत्थान एकादशी तक चलते हैं । इसीलिए कहावत बनी है –

आई होली भर लेगी झोली /आई  तीज बिखेरगी बीज

हरियाणा में  यह त्योहार व्रत-पूजा से कहीं अधिक महिलाओं की मस्ती और श्रंगार से जुड़ा रहा है। बहुत पहले तीज एक दिन तक सीमित नहीं होती थी। सावन भर बाग-बगीचों में पेड़ पर झूले पड़े रहते थे। महिलाएं इकट्ठी होकर झूले झूलने जाती थीं। गीत गाए जाते थे। घरों में दूध को काढ़ कर  सेवईयों की खीर बनाई जाती थी। अब वह अधिक दिन तक चलने वाली धूमधाम तो नहीं होती पर आज भी  हरियाणा में शादीशुदा बेटियों के यहां सिंगारा भेजा जाता है । सास, बहुओं को वस्त्र व  श्रृंगार   का सामान देती हैं । नव-विवाहिताएं पहली तीज मायके में अपनी सहेलियों के साथ मनाती हैं
माना जाता है कि  किसी भी त्योहार के दो पक्ष होते हैं। एक पक्ष रूढि़यों और व्रत-नियमों के पालन से जुड़ा है और दूसरा लोक-संस्कृति से। बड़े शहरों में आज स्त्रियां त्योहारों से संबंधित व्रत-नियम कायदों के प्रति पहले की तरह सख्त नहीं है , चाहे आज वह अपनी व्यस्तताओं व जीवन-शैली के कारण व्रत नहीं रखतीं या तीज के बारे में नहीं जानतीं, फिर भी तीज मेलों में शामिल होना, खाना-पीना, शॉपिंग करना, हाथों में मेहंदी लगाना उन्हें अच्छा लगता है।  तीज का पूरा त्योहार प्रकृति, प्रेम, मिलन और विरह के भावों से जुड़ा है। आज उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, राजस्थान समेत देश के विभिन्न राज्यों में तीज प्रेम, मस्ती और श्रृंगार  के विभिन्न रूपों में मनाई जा रही है।  भले  ही आज तीज के अवसर पर कजरी, मल्हार व हिंडोले गीत सुनने को नहीं मिलते।  पर  हर नई पीढ़ी के हाथों में तीज नए मायने हासिल कर रही है। छोटे गांव व शहरों की तीज की पारंपरिक सादगी बड़े शहरों में सिमट सी गई है। व्यस्त जीवनशैली, छोटे परिवार और प्रदर्शन की प्रवृत्ति ने इस त्योहार को घर, मंदिर, बाग-बगीचे से निकाल कर बाजार और बड़े-बड़े हाट-बजारों और क्लबों द्वारा कराए जाने वाले मेलों तक सीमित कर दिया है। फिर भी स्त्रियों के मेहंदी और लाल-हरी चूडि़यों  से सजे हाथ और मीठे पकवान खाने-खिलाने की परंपरा आज भी जारी है।यदि लोक-सांस्कृतिक पक्ष को मजबूत बना पूरा परिवार तीज को मनाता है तो यह वाकई खुशी की बात है।

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