Love ThEn and NOW

प्यार तब और अब ……………..

वक़्त कितनी तेजी से बदलता है न ? जब हमने होश संभाला तो इस तरह के रूमानी ख्यालों में खोये कि आज तह उभर नहीं पाए ,यह बात और है कि उम्र तमाम हुई इस के रूमानी दुनिया की खोज में 🙂 और आज के दिल्ली टाइम्स प्यार का यह रंग पढ़ा और लिखा हुआ अपना याद आया 
प्यार है इक एहसास…
दिल की धड़कनी को छूता राग…
या है पागल वसंती हवा कोई…
या है दिल में झिलमिल करती आशा कोई…
या प्यार है एक सुविधा से जीने की ललक…
जो देती है थके तन और मन को एक मुक्त गगन…

प्यार तब ……………….
अमृता को साहिर लुधियानवी से बेपनाह मोहब्बत थी।साहिर लाहौर में उनके घर आया करते थे और एक के बाद एक सिगरेट पिया करते थे। साहिर के जाने के बाद वो उनकी सिगरेट की बटों को साहिर के होंठों के निशान के हिसाब से दोबारा पिया करती थीं। इस तरह उन्हें सिगरेट पीने की लत लगी।
अमृता साहिर को ताउम्र नहीं भुला पाईं साहिर उनके लिए मेरे शायर, मेरा महबूब, मेरा खुदा और मेरे देवता थे। दोनों एक दूसरे को प्‍यार भरे खत लिखते थे।साहिर के लाहौर से बंबई चले आने और अमृता के दिल्‍ली आ बसने के कारण दोनों में भौगोलिक दूरी आ गयी थी।  बावजूद इसके साहिर भी कभी अमृता को दिल से दूर नहीं कर पाये। अगर अमृता के पास साहिर की पी हुई सिगरेटों के टोटे थे तो साहिर के पास भी चाय का एक प्‍याला था जिसमें कभी अमृता ने चाय पी थी। साहिर ने बरसों तक उस प्‍याले को धोया तक नहीं।
इमरोज़ अमृता के जीवन में 1958 में आये। दोनों इस मामले में अनूठे थे कि उन्होंने कभी भी एक दूसरे से नहीं कहा कि वो एक-दूसरे से प्यार करते हैं। दोनों पहले दिन से ही एक ही छत के नीचे अलग-अलग कमरों में रहते रहे। अमृता रात के समय लिखती थीं। जब न कोई आवाज़ होती हो न टेलीफ़ोन की घंटी बजती हो और न कोई आता-जाता हो।इमरोज लगातार चालीस पचास बरस तक रात के एक बजे उठ कर उनके लिए चाय बना कर चुपचाप उनके आगे रखते रहे।इमरोज़ के पास जब कार नहीं थी वो अक्सर उन्हें स्कूटर पर ले जाते थे और अमृता की उंगलियाँ हमेशा उनकी पीठ पर कुछ न कुछ लिखती रहती थीं… अक्‍सर लिखा जाने वाला शब्‍द साहिर ही होता था।

और प्यार अब …………..(@नवभारत दिल्ली टाइम्स)