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एक यात्रा

कहाँ है
अब वह
प्रकति के सब ढंग,
धरती के ,पर्वत के
सब उड़ गए हैं रंग..
पिछले दिनों हिसार जाना हुआ यह रास्ता मुझे वैसे भी बहुत भावुक कर देता
है |रोहतक जहाँ बचपन बीता उसके साथ लगता कलानौर जहाँ जन्म लिया ..क्या वह
घर अब भी वैसा होगा .कच्चा या वहां भी कुछ नया बन गया होगा ..बाग़ खेत
..कई यादे एक साथ घूम जाती है ..दिल्ली के कंक्रीट जंगल से कुछ पल सिर्फ़
राहत मिल जाती है और लगता है कि अभी भी कोई कोना तो है दिल्ली के आस पास
जो कुछ हरियाला है ..मेट्रो के कारण दिल्ली जगह जगह से उधडी हुई है .एक
जगह से दूसरी जगह जाने में एक युग सा लगता है ..वही हुआ बस तो “आई एस बी
टी “से ही मिलनी थी ,जिसने दिल्ली से बाहर निकलते निकलते ही ३ घंटे लगा
दिए …और उसके बाद का रास्ता ही सिर्फ़ तीन घंटे का है .रोहतक तक आते
आते अब खेत कुछ कम दिखायी देते हैं वहां भी अब “ओमेक्स के फ्लेट्स “का
बोर्ड लहरा रहा है | नींव तो पड़ ही चुकी है एक और कंक्रीट के जंगल की
……मन में चिंता होती है कि यूँ ही सब मकान बनते रहे तो खेत कहाँ
रहेंगे …और खेत नही रहेंगे तो खाने को क्या मिलेगा …पर “रोहतक से
हिसार “के दूर दूर तक फैले पीले सरंसों के फूल ,गेहूं की नवजात बालियाँ यह
आश्वासन देती लगती है कि “चिंता मत करो अभी हम है ,पर कब तक यह कह नही
सकते..”.तभी बीडी के धुएँ से बस के अन्दर ध्यान जाता है.हरियाणा की
बस है सो कम्बल लपेटे बेबाक से कई ताऊ जी बैठे हैं .कुछ ताई जी भी हैं जो
अभी भी हाथ भर घूँघट में हैं पर उनकी आँखे बाहर देख रही रही ..दिल्ली से
एक लड़के को सीट नही मिली है और रोहतक से आगे बस आ चुकी है ,वह सीट के साथ
बैठे ताऊ को थोड़ा अपना कम्बल समेट लेने को कहता है ,जिस से वह वहां बैठ
सके .पर ताऊ बड़ी सी हम्बे कर के उसको देखता है और फ़ैल कर बैठ जाता है
..लड़का फ़िर कहता है कि ‘मैंने भी टिकट ली है ,बैठने दो मुझे यहाँ
“‘…ताऊ उसको घूर कर कहता है कि “थम जा अभी महम आने पर मैं उतारूंगा तब
यहाँ बैठ लीजो ..टिकट रख ले अपने खीसे में ….”.और शान से अपनी बीडी का
धुंआ फेंकता है जो सीधे मेरी तरफ़ आता है और मैं रुमाल से अपना नाक बंद
कर लेती हूँ …लगता है कि इसको कुछ कहूँ पर लड़के को दिये जवाब से चुप हो
जाती हूँ …| ..

“महम” आ गया है और वह ताऊ जी उतर गए हैं …लड़का लपक के वह सीट ले लेता है
..बस फ़िर आगे को भागने लगती है …तभी मेरे सेल की घंटी बजती है और बहन
पूछती है कि कहाँ तक पहुँची तुम … “.महम “से बस निकल चुकी है कुछ ही देर
हुई है ..मैं कहती हूँ कि “हांसी “आने वाला है पहुँच जाउंगी कुछ देर में”
..तभी आगे की सीट पर उंघती महिला एक दम से चौकस हो जाती है और खिड़की से
बाहर देख कर मेरी तरफ़ देख के कहती है अभी “हांसी दूर है “..उन्होंने शायद
वहीँ उतरना है इस लिए एक दम से चौंक गई है …”सेल” पर मेरी बात सुन कर
..मैं कुछ सोच कर मुस्करा देती हूँ …मैं भी बाहर देखने लगती हूँ ..
गांव है ,घरों के आगे चारपाई पर हुक्के सुलगे हुए हैं .कई बुजुर्गवार
बैठे हैं …..घर के आगे की हवेली में “ट्रेक्टर और भैंसे ” बंधी हुई हैं
….सड़क के साथ ही एक स्कूल से लड़के नीली वर्दी पहने निकल रहे हैं औरजाते हुए ट्रेक्टर में लदे गन्नों को लपकने की कोशिश में हैं ….लडकियां
नही दिखती नीली वर्दी में ..कुछ आगे जाने पर दिखती है चेहरा ढके हुए
..कुछ सिर पर घडा रखे हैं ,पानी भरने जा रही है ,किसी के सिर पर चारा है
और कोई भेंसों को नहला कर घर की और ले जा रही है ..इस रास्ते से आते जाते
अब तक कई सालों से लड़कियों को सिर्फ़ इसी तरह से देखा है …
….आगे बैठा लड़का अब शायद अपनी “गर्ल फ्रेंड “से बात कर रहा है ..सेल पर
उसकी आवाज़ तेज है जो सुनाई दे रही है किसी बात पर मनाने की कोशिश है
,आवाज़ में बेचारगी है पर चेहरे पर आक्रोश है .अभी अभी आँखों में खिले
सपने हैं ..उसको देख कर नजर फेर लेती हूँ , कहीं मेरे यूँ देखने से वह
परेशान न हो जाए पर मेरे कान ,उसकी बातो को न चाहते हुए भी सुनते रहते हैं
…और फ़िर कुछ देर पहले उस औरत पर जो मुस्कराहट आई थी वह अपने ऊपर आ जाती
है …….इंसानी फितरत स्वभाव से मजबूर है .क्या करें …

ssssवापसी पर भी वही सब है भरी बस ,कम्बल लपेटे ताऊ जी ,आधे घूँघट में ताई जी
और बीडी का धुंआ ……जो रोहतक आते आते कम हो जाता है ….हिसार से
रोहतक तक तेज रफ़्तार और दिल्ली की शुरुआत होते ही वही कंक्रीट के जंगल
..मेट्रो का रास्ता बनाते मजदूर| बस अड्डे से ऑटो ले कर घर का रास्ता तय
हो ही रहा होता है | रास्ते में कई झुग्गियां टूटी हुई है ..यहाँ पर अब
मेट्रो का रास्ता बनेगा .फ़िर यह मजदूर और कागज़ बीनने वाले कहाँ रहेगे ?
ठण्ड भी कितनी है, बारिश भी हो रही है …उनके टूटे घरों में चूल्हा जल
रहा है शायद खाने पीने का काम जल्दी से ख़त्म कर के सोने की कोई जगह तलाश
करेंगे |
तभी एक जोर की ब्रेक ले कर “ऑटो” एक दम से घूम जाता है सामने के नजारा देख
कर मेरी रूह कांप जाती है .एक बाइक वाले ने सीधे जाते जाते एक दम से “यू
टर्न “ले लिया था, उसको बचाने के चक्कर में ऑटो वाले ने एक दम से ब्रेक
लागने की कोशिश की और एक ब्लू लाइन बस हमारे ऑटो को छूती हुई निकल गई
..यानी कुछ पल यदि नही संभलते तो अपना टिकट ऊपर का काटने वाला था …ऑटो
वाला सकते में कुछ पल यूँ ही खड़ा रहता है ….और फ़िर धीरे से कहता है
“मैडम आज तो बच गए “….मैं भी कुछ पल तक जैसे सकते में आ जाती हूँ |
रास्ते में फ़िर से टूटी झुग्गियों को देख कर सोचती हूँ कि इतनी ठण्ड में
यह अब कैसे रहेंगे …कुछ समय पहले लिखी अपनी कुछ पंक्तियाँ याद आने लगती
है ..
दिख रहा है ……
जल्द ही
दिल्ली का नक्शा बदल जायेगा
खेल कूद के लिए ख़ुद रहा है
दिल्ली की सड़कों का सीना
हर तरफ़ मिटटी खोदते
संवारते यह हाथ
न जाने कहाँ खो जायंगे
सजाती दिल्ली को
यह प्रेत से साए
गुमनामी में गुम हो जायेंगे
घने ठंड के कुहरे में
दूर गावं से आए यह मजदूर
फटे पुराने कपडों से ढकते तन को
ख़ुद को दे सके न चाहे एक छत
पर आने वाले वक्त को
मेट्रो और सुंदर घरों का
एक तोहफा
सजा संवार के दे जायेंगे !!

 



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