CHUNNIYON ME LIPTA DARD:Book Review

काव्य संग्रह -चुन्नियों में लिपटा दर्द
कवयित्री -हरकीरत हीर
प्रकाशक – अयन प्रकाशन
मूल्य – 250 /-
प्राप्ति लिंक – CHUNNIYON-LIPTA-DARD-HARKIRAT-HEER

 

कई बार मैं सोचती हूँ कि जब ईश्वर आंसू दर्द बाँट रहा होगा तो उसको “आदम और हव्वा “में कौन अधिक इसके लिए उपयुक्त लगा होगा ? या उस वक़्त की हव्वा ने कहीं अपनी किसी सोच में खुद को तो इस के लिए हाजिर तो नहीं कर दिया होगा ? या फिर सोचा होगा उसके पास एक आँचल है ,ममता का ,एक दिल है सहने का, इसी में सब अपने दर्द आंसू सहेज लूंगी और ज़िन्दगी का कारवां आगे बढता रहेगा । या क्या पता वह उस वक़्त तक आदम के अहम् और आदम के होने का वह चेहरा पहचान चुकी हो ,जिस से  बहस या अपने को व्यक्त करने में सृष्टि का सही ढंग से चलना संभव न हो ,कुछ तो हुआ होगा ,जो अधिकतर दर्द और उस से निकले शब्द औरत के हिस्से आये और वह उसके आँचल या दुप्पटे में लिपट कर  उसी के वजूद की तरह हिस्सा बन गए ।फिर जब जब उसने अपने इस दर्द से आज़ाद होने की कोशिश की वह कभी शब्द बन कर बिखरे तो कभी किसी किस्से का हिस्सा बने ,कुछ ब्यान हुए कुछ कुचल दिए गए ।”चुन्नियों में लिपटा दर्द “इसी दास्तान का सरांश है ,जिसको पढ़ते हुए मुझे लगा कि आज कहीं से इस दुनिया को बनाने वाला आ जाए और मैं उसको यह संग्रह दूँ और उस से वो सब जवाब मांगूं जो इस संग्रह की रचनाओं में है या इसको पढ़ते हुए मेरे दिल में हैं l.इस संग्रह की रचनाएं” हरकीरत हीर जी” ने जिस तरह से लिखी है वह आज भी अधिकतर औरत के उस दर्द को सांझा करती है ,और उस दर्द की शुरुआत उसके बचपन में दी गयी सीख से हो जाती है,

कभी 

बहुत बोला करते थे ये शब्द

बेवजह ही मुस्कराते थे,हंसते थे

सहेलियों के संग ठहाके लगाते

जवानी की दहलीज़ पर खड़े

खिलखिलाते थे…

माँ सुन लेती तो डांटती…

अरी पगली …!

लडकियां इतनी जोर से नहीं हँसा करती…

और कारण पूछने पर जवाब मिलता

ज्यादा हँसने वाली लड़कियों को

विवाह के बाद  रोना पड़ता है…

न जाने किसने  इस कारण का यही उपाय बताया होगा ,कौन जाने यह उपाय बताते वक़्त कौन सी सरस्वती बैठी होगी उस जुबान पर जो आज भी अधिकतर सच हो जाती है।

पैदा हुई बेटी ,न किसी ने सगुन मनाये, न किसी ने मंगल गीत गाये पर हाँ यह जानती है कि इस तरह की हिदायतों से उसके पंख कतर दिए जाते हैं ,मासूमियत कुचल दी जाती है और उसको विदा कर दिया जाता है इस तरह की सीख के साथ कि” तेरा मरना  जीना अब उसी देहरी के साथ ,बोलना वही जो वह घर चाहे ,बाँध दी है हमने इसी ओढ़ी चुन्नी के साथ हर बात और वो पंख जो आजादी की और देखे तो याद रखना ,वो उड़ान वापस बाबुल के घर की न हो ।तब  सच कहूँ तब वह चुन्नी मुझे लाल रंग के शोख चंचल रंग से ज्यादा उन पंखो के टूटे दर्द के खून से ज्यादा भीगी लगती है ,वह चूड़ियों की  ,कलीरों की आवाज़ उस ख़ामोशी की चीख अधिक लगती है जो कहीं अंदर ही अंदर दम तोड़ रही होती है इन्ही दर्दों को ,ख़ामोशी को पंखो की टूटन को हीर ने अपनी नज्मों में इस बखूबी से ब्यान किया है कि “बाबुल नज्म “की आखिरी पंक्ति मुझे कई उन दिलों की आवाज़ लगती रही जो मैंने अपने आस पास महसूस की है।

बाबुल से…

तेरे घर से विदा हो कर

तुझ तक उड़ान भरने के लिए

बाबुल…!

मैं ताउम्र अपने टूटे पंख

इकट्ठा करती रही!!

और वो पंख जैसे इन नज्मों में बिखर कर पूरे वजूद के साथ अपनी बात कह रहे हैं ।

“हीर ” की लेखनी मुझे अपने दिल के इसलिए भी करीब लगती है हम दोनों कहीं बहुत गहरे से “अमृता प्रीतम से जुड़े हैं ,और मुझे लगता है जिसने भी मोहब्बत और दर्द को बखूबी समझा है वह अमृता से जुडाव ही महसूस  करता है और फिर एक रिश्ता सा कायम हो जाता है पढने वाले और लिखने वाले के बीच में।

मैंने हीर के अब तक आये सभी संग्रह  पढ़े  हैं और उनके बारे में लिखा भी है ,हर संग्रह मुझे पहले संग्रह से अधिक दर्द और सच्ची बात कहता हुआ लगा है ।कहीं कहीं अमृता के लेखन सा भी ,पर यह स्वाभाविक है । उनकी कलम औरत के हर दर्द को अपन नज्मों में बहुत ही चुभते हुए अंदाज़ में जगह देती है और फिर वह दर्द आपको एक गहरी उदासी में लपेट लेता है ,क्यूंकि वह शब्द उस सच को बताते हैं जिस को आज भी समाज आसानी से सुन नहीं सकता ,फिर चाहे वह चारदिवारी के अन्दर सिसकती सिसकियाँ हो या फिर सामजिक संदर्भ से जुड़े हुए विषय तवाइफ़ ,बुजुर्ग या बलात्कार हो ।

इन सब के दर्द को समझने के लिए आपको अयन प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह को पढना होगा ,मैं यहाँ सब नज्में ब्यान नहीं कर सकती ,क्यूंकि हर नज्म की खूबसूरती उसको पढने में है उसके दर्द को समझने में है और उस से फिर पार होने में है .पर कुछ ऐसी है जिनको ब्यान करुँगी ताकि इस किताब के बारे में लिखा जाना और आपको प्रेरित करे इस संग्रह को पढने के लिए…

तुम्ही ने तो कहा था 

मोहब्बत ज़िन्दगी होती है 

और मैंने कई कई जन्म जी लिए थे 

तुम्हारी उस जरा सी मुहब्बत के बदले …

क्या सच नहीं यह ज़िन्दगी का ,क्या वाकई हम एक प्रेम के बोल के लिए ज़िन्दगी के उन हादसों को उन शब्दों को नहीं झेल जाते जो तोड़ देते हैं अन्दर तक यह सह नहीं जाते उन शब्दों के तीरों को जो ताउम्र छलनी कर देते हैं।

छिलते छिलते

नासूर बन गया है जख्म 

तुमने गाड़े भी तो थे 

गहरे तक धंसने वाले 

तीखे शब्द …

और यह तीखे शब्द  जब दिल में उतरते हैं तो तब उस दर्द को भी जुबान दे जाते हैं ,जो कविता बन कर   किसी दूसरे दिल को एक राहत दे जातें है कि अकेला नहीं मेरा दर्द ,यह किसी और का भी साँझा है।

शब्दों के तीरों से पैदा हुई यह खामोशी गवाह बन जाती है उसके गर्भ में पनपती हुई कविता का …

कल रात

तुम्हारे शब्दों के तीरों से

मर गए थे जो शब्द

आज उनकी अनयेष्टि करते वक़्त

देखा…

उनके गर्भ में

एक कविता थी…

और फिर अनितं सांस तक उस पेड़ के पत्ते से लगते हैं जहाँ सिर्फ दर्द ही उगता है।

नज़्म  बन कर साथ साथ चलना

इन इंसानो का क्या पता

कब तार तार कर दे

भावुक मन के हिस्से”…

पर आखिर कब तक या सब .इस किताब के शुरू में हीर का लिखा है

“उन औरतो के नाम

जो कतरा कतरा रोज जीती हैं

कतरा कतरा रोज़ मरती हैं। …”

और मुझे तो अब यही चुभता है ,वक़्त के साथ अब इनको बदलना होगा ,हर औरत को जिसकी चुन्नी में यह दर्द सिसक रहा है मुक्ति पानी होगी।

आखिर अब कोई तो नज्म वह लिखी जाए जो सिर्फ मुहब्बत के उस रंग को ब्यान करे जो सुर्ख हो जो खुशनुमा हो ।

हीर के इस संग्रह को आप पढ़े जरुर क्यूंकि मेरा  मानना है कि जब तक आप इन नज्मों की राह से नहीं गुजरेंगे तब तक आप मोहब्बत के सुर्ख रंग को भी नहीं समझ पायेंगे ,और नहीं समझ पायेंगे कि एक लड़की जब पैदा होती है ,जब विदा होती है ,जब वह एक पत्नी होती है या आपके दिल के आपके घर के किसी कोने को सजा रही होती है मुस्कराती हुई तो उस मुस्कान के पीछे कौन सा सफ़र उसने तय किया होता है ।सिर्फ एक आस में, एक उम्मीद में कि प्रेम का एक बोल ,मोहब्बत की एक छुअन उसके उन पंखों को उड़ान देगी जो उसके होने का वजूद बनेंगे ,उसकी एक पहचान बनेंगे उसका अपना एक आसमान बनेंगे ,तब किसी भी चुन्नी में लिपटा दर्द नहीं होगा ,सिर्फ एक सुखद एहसास होगा ,होने का सिर्फ खुद के होने का ।

यह लखनऊ से निकलने वाले समाचार- पत्र ‘समृद्वि न्यूज’ में प्रकाशित हुई है ….धन्यवाद

book review by Ranju Bhatia



2 thoughts on “CHUNNIYON ME LIPTA DARD:Book Review

  1. पुस्तक नहीं पढ़ी पर रिव्यू … जबरदस्त … पुस्तक किस तरह पढ़ी जाए सीखना ज़रूरी है … और अविता कैसे पढी जाय … कविता कहने और पढने शऊर जान लेने से इज्ज़त देना आ सकता है … पर क्या कविताओं का मूल्यांकन करना एक गुनाह जैसा नहीं लगता … हर शब्द उचित और अनमोल है … हर भाव हर बयान हर कथन जो कविता में नहित होता है सीप सा रहस्यमय …

    एक बात यकीन से कह सकते है … यह कलाबाजी नहीं है …

    1. शुक्रिया अशोक जी ,मैंने यह किताब पढ़ी भी दिल से और इसके बारे में लिखा भी दिल से ,पर अक्सर ऐसा होता है कि जिस को आप दिल से करते है इसका उतना रेस्पॉन्स नही मिलता ,पर आपने मेरे लिखे को समझा और इतना होंसला बढ़ाने वाला रेस्पॉन्स कॉमेंट दिया कि लगा कुछ तो लिखना सार्थक हुआ ,तहे दिल से आपका शुक्रिया

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