Book Review:इज्जत के नाम पर मुख्तार माई ,एक दस्तावेज़ Women day par vishesh

इज्जत के नाम पर मुख्तार माई ….एक दस्तावेज़
अरविन्द कुमार पब्लिशर्स
मूल्य सौ रुपये

मुख्तार माई एक बत्तीस वर्षीया पाकिस्तानी महिला है वह हिन्दुस्तान की सरहद के नजदीक दक्षिणी पंजाब के एक छोटे से गांव मीरवाला में रहती है
उसका यह एक ऐसा “जिंदगीनामा “है जो रूह को कंपकंपा देता है यह ज़िन्दगी नाम गांव की पंचायत कि मान्यता से किये गए सामूहिक बलात्कार से शुरू होता है और उसके पाकिस्तान की प्रतिनिधि  बन कर “अमेरिका” के सेनेट को संबोधित करने तक का तय करता है अपनी निजी त्रासदी से धूल का फूल बनने की बजाय इस अनपढ़ औरत ने अपने गांव में एक स्कूल खोल दिया है और अपनी ज़िन्दगी से कई कई जिंदगियां संवारने में कामयाबी हासिल की है …टाइम पत्रिका se महिला मुख्तार माई इस किताब के माध्यम से अपनी दास्तान सुना रही है …मुख़्तारन माई के साथ 22 जून 2002 को सामूहिक बलात्कार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने लाहौर हाई कोर्ट के फ़ैसले को बरक़रार रखते हुए मुख़्तारन माई के मुक़दमे में छह में से पांच अभियुक्तों  को रिहा करने का आदेश दिया है। हालांकि इससे पहले स्थानीय अदालत ने मुख़्तारान माई के साथ सामूहिक बलात्कार करने के आरोप में अब्दुल ख़ालिक़, अल्लाह दित्ता, फ़याज़ और ग़ुलाम फ़रीद सहित छह अभियुक्तों को मौत की सज़ा सुनाई थी। पंचायत का आरोप था कि मुख़्तारन माई के भाई शकूर का मस्तोई क़बीले की एक औऱत से नाजायज ताल्लुकात हैं और उस वजह से मुख़्तारन माई को यह सज़ा दी गई। क्या एक बारह साल का लड़का किसी औरत के साथ नाजायज रिश्ता कायम कर सकता ह? यह बहुत बड़ा सवाल है। पाकिस्तान में एक टेलीविजन चैनल को दिए इंटरव्यू में मुख्तार माई ने कहा कि पंचायत का फैसला पूर्व नियोजित था। जिसने पहले से यह तय कर रखा था कि उसे क्या करना है। मेरे भाई शकूर ko मोहरा बनाकर मेरी आबरू को तार-तार किया गया।

इस बर्बर घटना के क़रीब छह दिनों बाद मीरवाला की एक मस्जिद के इमाम जुमे की नमाज़ से पहले लोगों से कहा था कि वह इस सामूहिक  बलात्कार का कड़ा विरोध करें और पुलिस को इस बारे में इत्तला करें। उसके बाद पहली दफा यह यह मामला पाकिस्तानी मीडिया में आया। उसके बाद अमेरिकी अखबार न्यूयॉक टाइम्स ने इस पूरे मामले को प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया। लिहाजा मुख्तार माई के साथ हुए अन्याय की कहानी पूरी दुनिया भर में फैल गई। 30 जून 2002 को पाकिस्तान की स्थानीय पुलिस 14 लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया और मामले की सुनवाई शुरू हो गई। जिला अदालत ने 31 अगस्त 2002 को छह लोगों को मौत की सज़ा सुनाई थी और आठ लोगों को बरी करने के आदेश दिए थे। तीन मार्च 2005 को यह मामला लाहौर हाई कोर्ट के  मुल्तान खंडपीठ पहुंचा और अदालत ने ठोस सबूतों की कमी की बुनियाद पर इस मुक़दमे में पांच लोगों को बरी कर दिया, जबकि मुख्य अभियुक्त अब्दुल ख़ालिक़ की सज़ा-ए-मौत को उम्रकैद की सजा में तब्दील कर दिया। 1972 में पैदा हुईं मुख्तार माई को बलूच पंचायत की ओर से इज्जत के नाम पर सजा सुनाई कि उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया जाए। मस्तोई बलूच कबीले के कुछ लोगों ने ऐसा ही  किया। अमूमन औरतें इस तरह की घटना के बाद खुदकुशी कर लेती हैं, लेकिन मुख्तार उसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। दरअसल, मुख्तार माई  का यह किरदार सिर्फ मुकदमा जीतने और गुनहगारों को सजा दिलाने में नहीं दिखता। मुख्तार माई के अपने वर्णन में दो संदर्भ आए हैं उनमें स्वयं मेरी थेरेसी के शब्दों में, कहा कि अनेक क्षेत्रों की महिलाएं ‘मूक पशु’ की जिन्दगी बिता रही हैं। महिलाओं को लिये निर्णय उनकी सहमति के बिना अधिकतर पुरुष लेते हैं। उनके विरुध्द इज्जत के नाम पर जैसे बिना पारिवारिक अनुमति के विवाह करने या किसी लड़की के किसी युवक के साथ भाग जाने पर लड़की की हत्या को वैध माना जाता है। ऐसीे अनेक घटनाएं समय-समय पर प्रकाशित भी होती रहती है।”

मुख्तार माई मीरवाला में “वीमैन वेलफेयर आर्गनाइजेशन” की बुनियाद रखी। लड़कियों के लिए स्कूल खोला क्योंकि उनका मानना था कि पढ़ी-लिखी होने पर उनके साथ इस तरह का अन्याय नहीं होगा। वे अपनी बात कह सकेंगी और उनकी बात सुनी जाएगी। हालांकि मुख्तार माई को अपने मजबूत इरादे के चलते कई बार जान से मारने की धमकियां भी मिली। बावजूद इसके उसने अपना निर्णय नहीं बदला।

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मुख्तार माई का कहना है कि “सम्मान एक ज़हरीला शब्द है. यहां सम्मान सिर्फ़ मर्दों के लिए है, महिलाओं के लिए नहीं. किसी भी हाल में उन्हें ही ज़िम्मेदार ठहराया जाता है. महिलाओं के सम्मान का मालिक पिता, भाई और ससुर हैं.एक लड़की का अपना घर तक नहीं होता; पहले वह उसके पिता का घर होता है, फिर उसके पति का आख़िर में उसके बेटे का घर.वह व्यवस्था का एक हिस्सा है. जो कुछ मेरे साथ हुआ, वह

टाइम पत्रिका में निकोलस क्रिस्टाफ ने लिखा- मैं नहीं जानता कि गांधी या मार्टिन लूथर किंग को देखने वाले  पत्रकारों को क्या अहसास हुआ होगा, लेकिन मुख्तार माई के वजूद में मुझे  महानता सिर से पैर तक दिखती है।’

अल्लाह जब आपको कठिन परिस्थितियां देता है तब उसके साथ आप को उससे जूझने का साहस भी देता है – मुख्तारमाई।

 यह किताब आज के समाज को  आइना दिखाती है , जहाँ औरत आज भी महज एक चीज है , इस किताब को पढ़ते हुए अभी निर्भया केस पर बने डाक्यूमेंट्री में मुख्य आरोपी मुकेश का बिना किसी अपराध का सहज चेहरा याद आया और कानून के चंद रखवालो के ब्यान सुने हुए याद आये ,जहाँ आज भी हर जगह औरत ही दोषी है ,कैसे न्याय मिलेगा जब हमारी मानसिकता ही इतनी गिरी हुई है ,न जाने कैसे ब्यान दिए जाते हैं इन लोगों के मुहं से जहाँ  इनके घर में  माँ बेटी और बहन है ,पता नहीं वो वहां कैसे जीती होंगी उन  लोगों की गिरी हुई मानसिकता के साथ जो देश के लिए कानून के रखवाले हैं
आप को यह किताब मिले तो जरूर पढ़े ,आज महिला दिवस पर सिर्फ “Women day “नाम देने से अधिक जरूरत से मानसिकता , सोच को बदलने की

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