वह नहीं पढता मेरी कविता : By Uma Trilok

वह नहीं पढता मेरी कविता ,इस शीर्षक ने ही मुझे बहुत अपनी तरफ खींचा ,इसको पढ़ते ही लगा कि जैसे कोई बहुत मासूम सी शिकायत कर रहा ,फिर पढ़ा तो लगा जैसे कोई हंस के किसी को बता रहा है। जब  संग्रह में कवितायें पढ़ी तो लगा यह तो कोई मेरे ही मन की बात कर रहा है ,उमा जी का सहज लेखन और मासूम भाव इन संग्रह की विशेषता है ,,बिना किसी बंधन में बंधे यह लिखे शब्द अपनी बात इस संग्रह में अपनी बात कहते हैं ,क्योंकि
शब्द चुप नहीं रहते /शब्द बोलते हैं /चाहते  हैं कि सुने जाएँ /सुने जाने के बाद भी सुने जाएँ 
और जब पहले पेज पर ही यह शब्द अपनी इतनी प्यारी फ़रियाद करते हैं तो फिर तो पेज दर  पेज       आप इस संग्रह के सफर को तय करते जाते हैं और हर रचना में जैसे खुद को पाते हैं कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगा ,क्यों की मुझे “उमा जी” के लेखन में हमेशा अपने मन की ही बात दिखाई दी है ,जैसे हमारे सोचने का ढंग कई विषयों में एक सा लगा है ,क्योंकि शायद यही है शब्द की सम्भवना /शायद यही है शब्द की उपलब्धि
हमारी जीने के पल कितने हैं कोई नहीं जानता ,और ज़िन्दगी जीने में खोना पाना सब अपनी समझ के अनुसार है है ,इसी बात को उमा जी अपनी जीना। कविता में बखूबी ब्यान करती है ,कुछ पा लेने के बाद कुछ खो जाने का डर और उस से जुड़े अभाव हमारी इंसानी ज़िन्दगी को सहमति रहते हैं
सभी कहते हैं /बस यह पल /तुम्हारा है /जी भर कर /जी लेना इसे। यही जीना ,जीना है। .क्या है यह पल भर का जीना ?क्या है यह जी भर कर जीना ?
कितना स्वाभविक प्रश्न है जी अक्सर हमारे मन के भाव को मथन करता रहता है। पर अक्सर इस पहेली को उलझाते सुलझाते कविता  के अंत तक यही परिणाम निकला
बहुत विकट है  यह  जीना
इसे सहज बना लेना /क्या जीना है ?
क्या जीना ,जीना है आखिर
क्या जीना ,जीना है ?
इसी को समझते समझाते वह आगे लिखती है
 वह पल
जो मैंने तुम्हे दे दिया
मेरा  था ही नहीं वह पल तो सूरज चाँद ,फूलों सागर और देह का भोगना ,था और  उस  पल के उपहार को हम दोनों ने ही जीया।  कितना सरल सहज लिखा यह। एक सच्ची सी बात
उमा जी के इस काव्य संग्रह में ज़िन्दगी की बात के साथ साथ कुदरत से जुडी रचनाएं भी बखूबी लिखी है ,फूल नहीं मरते ,आज के पल पल बीतते वक़्त के सही तस्वीर खेंच देते हैं ,कि माहौल कितना ही दुश्वार क्यों न हो जिन्होंने महकना है वह खिल के रहेंगे और रूमानी हो कर अपनी बूंदों में लिखी कविता के जरिये कहेंगे
रिमझिम ,रिमझिम ,नीचे
ऊपर गर्जन चमके
मेरा मन अटका है लेकिन
तेरी उस कविता में
तुमने कहा था जिसमे
आ भीगे बूंदों में
आ भीगे बूंदों में
भीगता हुआ इन कविताओं में मन चल पड़ता है अगले पड़ाव पर ,जहाँ फिर मोहती है मेरी मन को उनकी लिखी कविता “एक शहर “की यह पंक्तियाँ जिसमे समुन्द्र के किनारे जहाज की रौशनी के शहर की बात है  ,जो रात बसता है ज़िन्दगी की तरह /जो अब है अब नहीं /हर रात इक नजम उभरती है। हर रात एक ख्वाब रचता है /इस हाँ और न के बीच जी लेती है ज़िन्दगी
इतना सुन्दर भाव ,इतने सरल शब्दों में बहुत पसंद आया
इसके बाद  “देह “कविता ने अपनी बात से आँखे नम कर दी
तुम्हे संभवतः
भाती होगी “मेरी देह “
मगर
मैं उब गयी आत्मा हूँ
एक ही देह पहने हुए
मन की गहरी भावनाएं ही है यह जो अक्सर हम खुद में बुनते सुलझाते उलझते रहते हैं। कई कवितायें पढ़ते हुए लगा कि जैसे मैं “उमा जी” के साथ बैठी कोई संवाद कर रही हूँ ,यदि किसी की लेखनी खुद से सामने संवाद करती दिखे तो यह उस लेखन की सफलता है। यह वह मासूम कवितायें हैं जो दिल से लिखी गयी है ,किसी साहित्य की परिभाषा की कसौटी में कसी नहीं गयी ,कोई बंधन शब्दों के में बंधी नहीं गयी ,तभी या सहज है ,सरल हैं जो सुनती है सुनाती है अपनी बात कहे और अनकहे के बीच
इस स्वर और उस स्वर के अंतराल को
ख़ामोशी को
मैं सुनती हूँ
मैंने भी यह संग्रह पढ़ते हुए इसी ख़ामोशी को दिल से सुना और बहुत सराहा ,यहाँ सभी कवितायें नहीं ली। इसको लिखने में सिर्फ यह इस संग्रह का एक स्क्रीन शॉट” ही समझे ,
ठीक वैसे ही जैसे किसी गहराई में डूबेंगे नहीं तो उसकी थाह पायेंगे कैसे ?
और अब चलते चलते बात उनकी इस कविता की जो इस संग्रह को वाकई ख़ास बनाती है
वह नहीं पढता मेरी कविता
लेकिन अगर वह पढता
तो पहले परिभाषा करता ,तय करता क्या लिखना है ,क्या नहीं ,बातें जम कर होती इस पुस्तक की उस पुस्तक की।
सही में यही अनुभव मैंने भी किया है कई बार की कविता लिखने के लिए कोर्स करो सुनने को मिल जाता है ,पर जवाब आज उमा जी की लिखी इस कविता में मिला
कैसे मैं उसको बतलाऊं
कविता मैं कहाँ लिखती हूँ
कविता मुझको लिखती है
यदि कोई इस बात को समझ ले तो फिर जाने। वह नहीं पढता मेरी कविता के सभी अर्थ इसी एक कविता में ब्यान हो जाते हैं। उमा जी के लिखे दिल की तरंगों का एहसास है ,मिलना है बिछड़ना है ,जुडाव है ,ज़िन्दगी है ,पल हैं लम्हे हैं और kudrat के रंग है जो हर बीतेते वक़्त की गवाही देते हैं
नीले आसमान के रंग के विस्तृत रंग में रंग या संग्रह बहुत मासूम है ,बहुत लुभावना है ,बच्चे से मन सा सरल ,इसमें विधाओं के काएदे कानून वाले इसको सरल भाव से पढ़े तो कहना और भी सही होगा वह पढ़े न पढ़े मेरी कविता ,पर मुझसे ज़िन्दगी लिखवा ही लेती है अपनी कविता।
आप उमा त्रिलोक जी का या संग्रह “सभ्या प्रकाशन से ले सकते हैं
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