यायावरी यादों की: Book Review

नीरज गोस्वामी जी से परिचय ब्लॉग के दिनों का है ,उनकी यह किताब “यायावरी यादों की संस्मरण” उन सभी के निट्ठलों के नाम है जो टाइम पास के नाम पर कुछ भी पढने को तैयार हो जाते है 🙂 ऐसा उन्होंने खुद अपनी इस किताब के पहले पेज पर लिखा है ,उसको पढ़ कर जो मुस्कान की एक लाइन आपके चेहरे पर आती है वही मुस्कान जैसे जैसे पेज पढ़ते जाते हैं और गहरी होती जाती है ,कारण एक तो आप ब्लॉग जगत से उनसे परिचित है सो वह यादें यानी” टिप्पणी लेन देन प्रक्रिया” पढ़ते ही उस वक़्त की यादों में पहुँच जाते है ,वाकई क्या दिन  रहे वो ब्लगिंग के ,भूले नहीं भूलते ,फिर उनकी वह “खोपोली  यात्रा “khopoli )की लिखी बातें और ब्लॉगर होने की शर्तों की  छूट बरबस दिल में “खोपोली यात्रा “के लिए आपको पढ़ते ही जाने के लिए उकसाने लगती है ,( अब यह  छूट है या नहीं यह आप नीरज जी से पता कर ले यदि आप ब्लॉगर है तो )
 मुंबई (mumbai )के पास यह जगह उनके लिखे शब्दों से और भी सुन्दर हो उठी है ,मैंने लोनावाला देखा है ,पर यह पढ़ते ही उस से अधिक सुन्दर लगा ,सूर्यास्त का नजारा बहुत ही मनमोहक है ,चित्र चाहे श्याम सफेद है पर लिखे शब्द उन में रंग भर देते दते हैं ,उनका यह शेर सच लगता है ,
धूप में निकलो घटाओं में नाहा कर देखो
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटा कर देखो “
और वाकई पढ़ तो सब लेते हैं पर जाने के नाम सच में यही कहते है देखेंगे सोचेंगे 🙂 उनके इसी तरह का लेखन इस किताब की सहज स्वभाविकता है और बीच में कहीं गयी छोटी छोटी चुटकियाँ मजेदार बना देती है
फिर आगे “चीन यात्रा “(Cheen )तो इतनी रोचक लगी और मजेदार लगी कि चेहरे पर चिपकी मुस्कान कब जोर से हंसी तब्दील हो गयी  यह जब जाना तब साथ वाले कमरे से कोई दूसरा आपको हैरानी  से देखने आये 🙂 वहां के खाने पीने के रंग ढंग ,सफाई के चर्चे और उस से बढ़ कर भारतीय भोजन की तलाश में “दिल्ली दरबार”(Delhi Darbar) की खोज बहुत ही रोचक है .इतने सफाई पसंद देश की यात्रा के बाद अपने देश की रेलपेल और सफाई की हालत मुस्कान भी देते है पढ़ें वाले को और अपनी असलियत से भी वाकिफ करवाते हैं कि “हम जैसे है वैसे ही रहेंगे “सुधार नामुमकिन है
लुधियाना में देखी धर्मेन्द्र पाजी की पिक्चर और सिनेमा हाल के अंदर का वर्णन तो हंसा हंसा के लोट पोट कर गया उस पर इंटरवल में खाने खिलाने का ज़िक्र कभी नहीं भूल सकते ,फिर इस यात्रा संस्मरण का ज़िक्र “माथेरान यात्रा “पर ले जाता है पंजाब से दिल फिर से मुंबई की इस खूबसूरत जगह पहुंच जाता है ,टॉय ट्रेन की यात्रा करते हुए वहां के नज़ारे ले ही रहे होते है ,कि अगले पन्ने आपको दिल्ली प्रगति मैदान पुस्तक मेला पंहुचा देते हैं ,इस मेले से मैं अच्छे से परिचित हूँ ,इसलिए जो नीरज जी ने लिखा वो अक्षरश सच है ,हिंदी की जो दशा वहां देखी है ख़ास कर युवा पीढ़ी के नजरों में विचारों में वह झूठ नहीं है ,खुद मैंने भी यही देखा सुना है ,
मैंने भी नीरज जी से यह  किताब ,पुस्तक मेले में ही लेने की ही कोशिश की थी ,तब वहां आई नहीं थी ,नीरज जी ने मुझे भेजने का वादा किया ,मेरी भी घुम्म्कड़ी रूकती नहीं ,केरला जाते हुए नीरज जी को मेसज किया भेज दो आपकी किताब को वहां घुमा लाती हूँ ,पर तब भी न आने के कारण यह केरला नहीं घूम सकी ,अभी “यूएसऐ ” (USA)जाने का हुआ था ,वीजा तो नहीं मिला पर यह किताब मिल गयी तो इसको यही दिल्ली में आज होली के दिन इसके लिखे शब्दों के रंगों में मुस्कराहट के बीच में पढ़ा गया जो होली को सार्थक बना गया ,आप भी जब बोर हो रहे हो हँसना मुस्कराना चाहे तो इस “यायावरी यादो की ” को पढ़ कर खुद को तरोताजा कर ले ,हलके फुल्के अंदाज़ में लिखी यह किताब आपको खोपोली ,चीन ,पंजाब आदि की सैर एक साथ बहुत ही मजेदार अंदाज़ में करवा देगी नीरज जी के लिखे इस शेर के सही अंदाज़ में
खिडकियों से झांकना बेकार है
बारिशों में भीग जाना सीखिए


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