बुल्ला कि जानाँ मैं कौन ?

हाजी लोक मक्के नूँ जान्दे,
मेरा राँझण माही मक्का,
नी मैं कमली आँ।

बुल्ले शाह के नाम से कौन परिचित न होगा ? बुल्ला कि जानाँ मैं कौन ? जैसे लिखने वाले के बारे में आज हम जानेंगे इस पोस्ट में

 

कौन थे बुल्ले शाह ?

बुल्ले शाह एक पंजाबी सूफ़ी संत एवं कवि थे। उनका जन्म सन् 1680 में हुआ था।उनके जन्मस्थान के बारे में इतिहासकारों की दो राय हैं। सभी का मानना है कि बुल्ले शाह के माता-पिता पुश्तैनी रूप से वर्तमान पाकिस्तान में स्थित बहावलपुर राज्य के “उच्च गिलानियाँ” नामक गाँव से थे, जहाँ से वे किसी कारण से मलकवाल गाँव (ज़िला मुलतान) गए। मालकवल में पाँडोके नामक गाँव के मालिक अपने गाँव की मस्जिद के लिये मौलवी ढूँढते आए। इस कार्य के लिये उन्होंने बुल्ले शाह के पिता शाह मुहम्मद दरवेश को चुना और बुल्ले शाह के माता-पिता पाँडोके (वर्तमान नाम पाँडोके भट्टीयाँ) चले गए। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बुल्ले शाह का जन्म पाँडोके में हुआ था और कुछ का मानना है कि उनका जन्म उच्च गिलानियाँ में हुआ था और उन्होंने अपने जीवन के पहले छः महीने वहीं बिताए थे।बुल्ले शाह के दादा सय्यद अब्दुर रज्ज़ाक़ थे और वे सय्यद जलाल-उद-दीन बुख़ारी के वंशज थे। सय्यद जलाल-उद-दीन बुख़ारी बुल्ले शाह के जन्म से तीन सौ साल पहले सुर्ख़ बुख़ारा नामक जगह से आकर मुलतान में बसे थे। बुल्ले शाह मुहम्मद की पुत्री फ़ातिमा के वंशजों में से थे।बुल्ले शाह का असली नाम अब्दुल्ला शाह था। उन्होंने शुरुआती शिक्षा अपने पिता से ग्रहण की थी और उच्च शिक्षा क़सूर में ख़्वाजा ग़ुलाम मुर्तज़ा से ली थी। पंजाबी कवि वारिस शाह ने भी ख़्वाजा ग़ुलाम मुर्तज़ा से ही शिक्षा ली थी। उनके सूफ़ी गुरु इनायत शाह थे।

बुल्ले शाह के गुरु

परमात्मा की दर्शन की तड़प उन्हें फ़कीर हज़रत शाह कादरी के द्वार पर खींच लाई। हज़रत इनायत शाह का डेरा लाहौर में था। वे जाति से
अराईं थे। अराईं लोग खेती-बाड़ी, बागबानी और साग-सब्जी की खेती करते थे। बुल्ले शाह के परिवार वाले इस बात से दुखी थे कि बुल्ले शाह
ने निम्न जाति के इनायत शाह को अपना गुरु बनाया है। उन्होंने समझाने का बहुत यत्न किया परन्तु बुल्ले शाह जी अपने निर्णय से
टस से मस न हुए।

अपनी एक कविता में उन्होंने कहा:बुल्ले को समझाने बहनें और भाभियाँ आईं
(उन्होंने कहा) ‘हमारा कहना मान बुल्ले, आराइनों का साथ छोड़ दे
नबी के परिवार और अली के वंशजों को क्यों कलंकित करता है?’
(बुल्ले ने जवाब दिया) ‘जो मुझे सैय्यद बुलाएगा उसे दोज़ख़ (नरक) में सज़ा मिलेगी
जो मुझे आराइन कहेगा उसे बहिश्त (स्वर्ग) के सुहावने झूले मिलेंगे
आराइन और सैय्यद इधर-उधर पैदा होते रहते हैं, परमात्मा को ज़ात की परवाह नहीं
वह ख़ूबसूरतों को परे धकेलता है और बदसूरतों को गले लगता है
अगर तू बाग़-बहार (स्वर्ग) चाहता है, आराइनों का नौकर बन जा

भाव – जो हमे सैयद कहेगा उसे दोजख की सजा मिलेगी और जो हमे अराईं कहेगा वह स्वर्ग में झूला झूलेगा।

बुल्ले शाह की रचनाएं (परिचय )

उनकी काव्य रचना उस समय की हर किस्म की धार्मिक कट्टरता और गिरते सामाजिक किरदार पर एक तीखा व्यंग्य है। उनकी रचना लोगों
में अपने लोग जीवन में से लिए अलंकारों और जादुयी लय की वजह से बहुत ही हर मन प्यारी है। इन्होंने अपने मुरशद को सजण, यार,
साईं, आरिफ, रांझा, शौह आदि नामों से पुकारा है| बाबा बुल्ले शाह ने बहुत बहादुरी के साथ अपने समय के हाकिमों के ज़ुल्मों और धार्मिक
कट्टरता विरुद्ध आवाज़ उठाई। बाबा बुल्ले शाह के लिखे  में काफ़ियां, दोहड़े, बारांमाह, अठवारा, गंढां और सीहरफ़ियां शामिल हैं ।

बुल्ले शाह के बारे में प्रचलित कहानियाँ

जैसे सभी धार्मिक लोगों के साथ दंत-कथाएँ जुड़ जाती हैं, वैसे ही बुल्ले  शाह जी के साथ भी कई ऐसी कथाएं जुड़ी हुई हैं । इन कथायों का
वैज्ञानिक आधार चाहे कुछ भी न हो परन्तु जन-मानस में उनका विशेष स्थान अवश्य रहता है ।
बुल्ले शाह व उनके गुरु के सम्बन्धों को लेकर बहुत सी बातें प्रचलित हैं, बुल्ले शाह जब गुरू की तलाश में थे; वह इनायत जी के पास बगीचे
में पहुँचे, वे अपने कार्य में व्यस्त थे; जिसके कारण उन्हें बुल्ले शाह जी के आने का पता न लगा; बुल्ले शाह ने अपने आध्यात्मिक अभ्यास
की शक्ति से परमात्मा का नाम लेकर आमों की ओर देखा तो पेड़ों से आम गिरने लगे; गुरु जी ने पूछा, “क्या यह आम अपने तोड़े हैं?” बुल्ले
शाह ने कहा “न तो मैं पेड़ पर चढ़ा और न ही पत्थर फैंके, भला मैं कैसे आम तोड़ सकता हूँ;” बुल्ले शाह को गुरु जी ने ऊपर से नीचे तक
देखा और कहा, “अरे तू चोर भी है और चतुर भी;” बुल्ला गुरु जी के चरणों में पड़ गया; बुल्ले ने अपना नाम बताया और कहा मैं रब को
पाना चाहता हूँ । साईं जी उस समय पनीरी क्यारी से उखाड़ कर खेत में लगा रहे थे उन्होंने कहा, “बुल्लिहआ रब दा की पौणा। एधरों पुटणा
ते ओधर लाउणा” इन सीधे-सादे शब्दों में गुरु ने रूहानियत का सार समझा दिया कि मन को संसार की तरफ से हटाकर परमात्मा की ओर
मोड़ देने से रब मिल जाता है । बुल्ले शाह ने यह प्रथम दीक्षा गांठ बांध ली।

बुल्ले शाह की मृत्यु

बुल्ले शाह की मृत्यु 1757 से 1759 के बीच क़सूर (वर्तमान पकिस्तान )में हुई थी। कसूर सूफ़ी कवि फ़कीर बाबा बुल्ले शाह की मजार होने के कारण बहुत मशहूर है। कहतें हैं कि शहर का नाम हिन्दू भगवान राम के दूसरे पुत्र कुश के नाम पर कुशपुर था, जो कालांतर में बिगड़ कर कसूर हो गया।

बुल्ले शाह के कुछ प्रचलित दोहे

भट्ठ नमाज़ां ते चिकड़ रोज़े, कलमे ते फिर गई स्याही ।
बुल्ल्हे शाह शहु अन्दरों मिल्या, भुल्ली फिरे लुकाई ।

बुल्ल्हा कसर नाम कसूर है, ओथे मूंहों ना सकन बोल ।
ओथे सच्चे गरदन मारीए, ओथे झूठे करन कलोल ।

बुल्ल्हे चल बावरचीखाने यार दे, जित्थे कोहा कोही हो ।
ओथे मोटे कुस्सन बक्करे, तूं लिस्सा मिले ना ढो ।

बुल्ल्हे नूं लोक मत्तीं देंदे, बुल्ल्हआ तूं जा बहु मसीती ।
विच मसीतां की कुझ हुन्दा, जो दिलों नमाज़ ना कीती ।
बाहरों पाक कीते की हुन्दा, जे अन्दरों ना गई पलीती ।
बिन मुरशद कामल बुल्ल्हआ,तेरी ऐवें गई इबादत कीती।

तो “बुल्ला कि जानाँ मैं कौन “वाकई अपने में पहुंचे हुए सूफी कलमकार थे जिनके लिखे हुए को लोग आज भी चाव से सुनते पढ़ते हैं .

 

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