‘दोहे तरह तरह के “हिंदी भाषा में दोहे

हिंदी भाषा में दोहों का अपना ही महत्व है ,आज इस पोस्ट में तरह तरह के दोहे के विषय में जानेंगे

दोहा क्या है ?

 

दोहा अर्द्धसम मात्रिक छंद है। दोहे के चार चरण होते हैं। इसके विषम चरणों (प्रथम तथा तृतीय) में १३-१३ मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) में ११-११ मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के आदि में प्राय: जगण (।ऽ।) टालते है, लेकिन इस की आवश्यकता नहीं है। ‘बड़ा हुआ तो’ पंक्ति का आरम्भ ज-गण से ही होता है। सम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है अर्थात अन्त में लघु होता है।

उदाहरण-

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागैं अति दूर।।

सुन्दर लाल जी के दोहे

कोनो है झालर धरे, कोनो है घड़ियाल।
उत्ताधुर्रा ठोंकैं, रन झांझर के चाल॥
पहिरे पटुका ला हैं कोनो। कोनो जांघिया चोलना दोनो॥
कोनो नौगोटा झमकाये। पूछेली ला है ओरमाये॥
कोनो टूरा पहिरे साजू। सुन्दर आईबंद है बाजू॥
जतर खतर फुंदना ओरमाये। लकठा लकठा म लटकाये॥
ठांव ठांव म गूंथै कौड़ी। धरे हाथ म ठेंगा लौड़ी॥
पीछू मा खुमरी ला बांधे। पर देखाय ढाल अस खांदे॥

गुरु ग्रन्थ साहिब में कबीर जी के दोहे

इस में कबीर के 224 शब्द है ,

गुरुग्रन्थ साहिब में मात्र सिख गुरुओं के ही उपदेश नहीं है, वरन् 30 अन्य हिन्दू संत और अलंग धर्म के मुस्लिम भक्तों की वाणी भी सम्मिलित है। इसमे जहां जयदेवजी और परमानंदजी जैसे ब्राह्मण भक्तों की वाणी है, वहीं जाति-पांति के आत्महंता भेदभाव से ग्रस्त तत्कालीन हिंदु समाज में हेय समझे जाने वाली जातियों के प्रतिनिधि दिव्य आत्माओं जैसे कबीर दास ,नामदेव , सैण जी, सघना जी, छीवाजी, धन्ना की वाणी भी सम्मिलित है। पांचों वक्त नमाज पढ़ने में विश्वास रखने वाले शेख फरीद के श्लोक भी गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज हैं। अपनी भाषायी अभिव्यक्ति, दार्शनिकता, संदेश की दृष्टि से गुरु ग्रन्थ साहिब अद्वितीय है। इसकी भाषा की सरलता, सुबोधता, सटीकता जहां जनमानस को आकर्षित करती है। वहीं संगीत के सुरों व 31 रागों के प्रयोग ने आत्मविषयक गूढ़ आध्यात्मिक उपदेशों को भी मधुर व सारग्राही बना दिया है।

वरदराज के दोहों के बारे में

वरदराज पहले मुर्ख बालक समझे जाते थे ,बाद में  संस्कृत के बहुत बड़े विद्वान् बनें और उन्होनें संस्कृत के तीन ग्रन्थ की रचना की –

  1. मध्यसिद्धान्तकौमुदी
  2. लघुसिद्धान्तकौमुदी
  3. सारकौमुदी
    उनके जीवन पर एक दोहा जो बहुत लोकप्रिय हैं –
    ” करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान 
    रस्सी आवत जात के सिल पर परत निशान “
    दोस्तों सच्ची लगन से निरंतर प्रयास करने पर कैसा भी कठिन कार्य आसान हो जाता हैं। जिस प्रकार कुएँ से पानी निकालने वाली मुलायम रस्सी के बार बार घिसने से जगत के मजबूत पत्थर पर निशान आ जाते हैं।
    तो यह थे तरह तरह के दोहे ,जिनके बारे में रोचक जानकारी इस पोस्ट में पढने को मिली

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