चाँद और करवाचौथ : Amrita Preetam

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नजर के आसमान से

सूरज कहीं दूर चला गया
पर अब भी चाँद में .
उसकी खुशबु आ रही है …

तेरे इश्क की एक बूंद
इस में मिल गई थी
इस लिए  मैंने उम्र की
सारी  कडवाहट  पी ली ..

अमृता के कहे से :
Amrita Preetam का कहना था कि दुनिया कि कोई भी किताब हो हम   उसके चिंतन का दो बूंद पानी जरुर उस से ले लेते हैं ..और फ़िर उसी से अपना मन मस्तक भरते चले जाते हैं .और फ़िर जब हम उस में चाँद की परछाई देखते हैं तो हमें उस पानी से मोह हो जाता है …हम जो कुछ भी किताबी से लेते  हैं वह अपना अनुभव नही होता वह सिर्फ़ सहेज लिया जाता है ….अपना अनुभव तो ख़ुद पाने से मिलता है …इस में भी एक इबारत वह होती है जो सिर्फ़ बाहरी  दुनिया की सच्चाई लिखती है ,पर एक इबारत वह होती है जो अपने अंतर्मन  होती है और वह सिर्फ़ आत्मा के कागज पर लिखी जाती है ….

यात्रा का इश्क ……….
इस जेहनी और रूहानी लिखने का सिलसिला बहुत लंबा होता है जो परिवार चेतना के विकास की जमीन पर बनता है इसी जमीन पर संस्कारों के पेड़ पनपते हैं और इसी में अंतर्मन की एक झील बहती रहती है ..पर इस के तर्क दिल के गहरे में कहीं छिपे होते हैं .जो कभी किसी की पकड़ में आते हैं ..कभी नही आते …..तब उँगलियों के पोरों से यह गांठे खोलनी होती है और यही सच्चे इश्क का तकाजा है …और यही इस चेतन यात्रा का इश्क कहलाता है …..

चाँद और करवाचौथ ……….

Amrita Preetam की एक नज्म  है जिस में इस सारे अमल को उन्होंने सुइयां चुनना कहा था …जिसके लिए प्रतीक उन्होंने एक बहुत पुरानी कहानी से लिए थे ….इस कहानी में एक औरत सुबह की बेला में अभी बैठी ही थी कि उसका मर्द बहुत बुरी तरह से जख्मी हालात में घर आया ..किसी दुश्मन ने उसके सारे शरीर में सुइयां पीरों दी थी ….वह औरत अपने मर्द के रोम रोम में सुइयां देख कर तड़प गई …तभी उसको एक आकाश वाणी सुनाई दी ..अगर वह   भूखी प्यासी रह कर अपन मर्द के बदन से सुइयां चुनती रहे तो शाम के वक्त चाँद निकलते ही उसका मर्द ठीक स्वस्थ हो जायेगा ….

अब यह कहानी कब घटित हुई …किन अर्थों में घटी .इसका कुछ पता नही है ..पर वह एक सुहागन औरत के लिए एक प्रतीक  बन गई ..Karwachouth का व्रत रखने का ..जिस में वह सूरज निकलने से पहले कुछ खा पी कर सारा दिन  भूखी प्यासी रहती है उस दिन उसके लिए घर का सारा काम वर्जित होता है ..न वह चरखा कातती है ..न चक्की को हाथ लगाती है .और गहरी संध्या होने पर .चाँद को अर्ध्य दे कर पानी पीती है .और कुछ खाती है …और यह मान लेती है कि इस तरह से उसने अपने मर्द के सारे दुःख उसके बदन से चुन लिये हैं …..karwa-chauth-celebrations-300x225

अमृता ने इस कहानी को चेतन के तौर पर इस्तेमाल किया और एक नज्म लिखी

मैं पल भर भी नही सोयी ,घड़ी भर भी नही सोयी
और रात मेरी आँख से गुजरती रही
मेरे इश्क के बदन में ,जाने कितनी सुइयां उतर गई हैं ..

कहीं उनका पार नही पड़ता
आज धरती की छाया आई थी
कुछ मुहं जुठाने को लायी थी
और व्रत के रहस्य कहती रही

तूने चरखे को नही छूना
चक्की को नही छूना
कहीं सुइयां निकालने की बारी न खो जाए

यौवन —जो मेरे बदन पर बौर की तरह पडा है
और प्यास से बिलखने लगा
और सुइयां निकालते निकालते ,संध्या की बेला हो गई है

मैं कहाँ अर्ध्य दूँ ! कहीं कोई चाँद नही दिखता
सोचती हूँ –यह जो सुइयां निकाल दी है
शायद यही मेरी उम्र भर की कमाई है ….

अमृता की इस नज्म में इस कहानी की सुइयां –हर तरह के समाज .महजब और सियासत की और से इंसान को दी हुई फितरी ,जेहनी और गुलामी का प्रतीक हैं ..जिनसे उसने अपने आप को आजाद करना है …

इस पूरी कहानी में दो किरदार दिखते हैं एक मर्द और औरत ..पर ध्यान से देखे  और इस चिंतन की गहराई में उतरे तो एक ही किरदार है वह है इंसान ..यह दो पहलू हर इंसान की काया में होते हैं ..मर्द की काया में मर्द उसका चेतन मन होता है और औरत अचेतन मन ..औरत की काया में औरत उसका चेतन मन और मर्द उसका अचेतन मन होता है ..सुइयां निकालना यहाँ चेतन यत्न है …सिर्फ़ परछाइयों को पकड़ने से जीया नही जा सकता है ..अपने भीतर एक आग एक प्यास निरंतर जलाए रखना जरुरी है

अमृता और मैं ,करवाचौथ और चाँद के बहाने से :चित्र गूगल के सोजन्य से 



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